•   Saturday, 23 May, 2026
One day workshop concludes to disseminate agricultural techniques in eastern Uttar Pradesh; experts crop diversification and climate friendly farming

पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृषि तकनीकों के प्रसार हेतु एकदिवसीय कार्यशाला सम्पन्न, धान की सीधी बुवाई, फसल विविधीकरण एवं जलवायु-अनुकूल खेती पर विशेषज्ञों ने दिया विशेष जोर

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पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृषि तकनीकों के प्रसार हेतु एकदिवसीय कार्यशाला सम्पन्न, धान की सीधी बुवाई, फसल विविधीकरण एवं जलवायु-अनुकूल खेती पर विशेषज्ञों ने दिया विशेष जोर

वाराणसी/23 मई 2025

उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (उपकार), लखनऊ एवं कृषि विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में “पूर्वी क्षेत्रीय एकदिवसीय कार्यशाला : भविष्य के लिए कृषि तकनीकें” विषयक कार्यशाला का आयोजन सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। 
तत्पश्चात उपकार के उपमहानिदेशक डॉ. परमेन्द्र सिंह एवं डॉ. सुशील कुमार यादव द्वारा अतिथियों को बुके एवं स्मृतिचिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।

कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित इरी-आइसार्क (IRRI-ISARC) के वैज्ञानिक डॉ. आर. के. मलिक ने किसानों एवं एफपीओ प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश विशेषकर वाराणसी, गाजीपुर, चंदौली, मिर्जापुर, कुशीनगर, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोंडा, अयोध्या एवं लखीमपुर जैसे जनपदों में धान की सीधी बुवाई (Direct Seeded Rice-DSR) की अपार संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में संभावित जल संकट, बढ़ती मजदूरी एवं खेती की लागत को कम करने के लिए DSR तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में लगभग 95 प्रतिशत किसान अभी भी पारंपरिक रोपाई विधि से धान की खेती कर रहे हैं, जबकि सीधी बुवाई तकनीक से जल, श्रम एवं समय की उल्लेखनीय बचत संभव है। 
वैज्ञानिकों ने बताया कि पंजाब की तुलना में उत्तर प्रदेश में नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) एवं पोटाश (K) उर्वरकों का संतुलित उपयोग अभी भी चुनौती बना हुआ है, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है।

कार्यशाला में कृषि विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. यू. पी. सिंह ने कहा कि धान उत्पादन में आधुनिक तकनीकों का अपनाव गेहूँ की अपेक्षा अभी काफी कम है। 
बताया गया कि पूर्वी भारत में अभी भी लंबी अवधि वाली धान की प्रजातियाँ जैसे MTU-7029 का प्रभुत्व है, जबकि पंजाब जैसे राज्यों में कम अवधि वाली प्रजातियाँ अपनाई जा रही हैं।

डॉ. एस. के. सिंह (विभागाध्यक्ष, आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन) ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एवं घटते जल संसाधनों को देखते हुए कम अवधि एवं जल-संरक्षण आधारित किस्मों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। 
साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि प्रदेश में संकर धान (Hybrid Rice) का अपनाव अभी 10 प्रतिशत से भी कम है तथा पुरानी प्रजातियाँ अब भी अधिक क्षेत्र में प्रचलित हैं।

डॉ. एस. पी. सिंह (प्रोफेसर, शस्य विज्ञान) ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा शोध आधारित नई जलवायु-अनुकूल एवं उच्च उत्पादकता वाली प्रजातियों पर कार्य किया जा रहा है, जिनका लाभ भविष्य में किसानों को मिलेगा। 
उन्होंने उत्तर प्रदेश में मक्के की बढ़ती संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मक्का भविष्य की बहुउपयोगी फसल के रूप में तेजी से उभर रहा है। 
मक्का “4F मॉडल” अर्थात Food (खाद्य), Feed (पशु आहार), Fodder (चारा) एवं Fuel (जैव ईंधन) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण फसल है, जिससे किसानों की आय वृद्धि एवं कृषि आधारित उद्योगों को नई दिशा मिल सकती है।

कार्यशाला में उपस्थित डॉ. कार्तिकेय श्रीवास्तव ने सरसों की फसल पर विश्वविद्यालय में चल रहे शोध परिणामों की विस्तृत जानकारी साझा की। 
इस एकदिवसीय कार्यशाला के कनवेनर डॉ. पी. के. सिंह ने वैज्ञानिक खेती, उन्नत बीज, जल प्रबंधन, फसल विविधीकरण एवं क्षेत्र विशेष आधारित तकनीकों पर विस्तार से जानकारी प्रदान की। 
उन्होंने बल दिया कि “लोकेशन स्पेसिफिक टेक्नोलॉजी” अपनाए बिना कृषि की उत्पादकता एवं स्थिरता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

अंत में अध्यक्षीय सम्बोधन देते हुए उपकार के महानिदेशक डॉ. संजय सिंह ने कहा कि किसानों एवं एफपीओ द्वारा उठाए गए मुद्दों के अनुरूप कृषि अनुसंधान को और अधिक व्यवहारिक बनाया जाएगा। 
उन्होंने बताया कि चयनित एफपीओ प्रतिनिधियों को विशेष प्रशिक्षण हेतु भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (IIMR), हैदराबाद भेजा जाएगा ताकि वे आधुनिक कृषि तकनीकों, मूल्य संवर्धन एवं कृषि उद्यमिता की जानकारी प्राप्त कर सकें।

विशेषज्ञों ने किसानों से धान-गेहूँ फसल पद्धति के साथ-साथ मक्का, दलहन एवं तिलहन आधारित फसल चक्र अपनाने की अपील की। वैज्ञानिकों ने बताया कि रेनफेड (वर्षा आधारित) क्षेत्रों के लिए अलग तकनीकी मॉडल विकसित किए जा रहे हैं, जिससे कम संसाधनों में भी किसानों की आय बढ़ाई जा सके।

कार्यक्रम में डॉ कल्याण गढ़ई, डॉ राम सिंह, डॉ नवीन कुमार सिंह, डॉ रिन्नी सिंह, राष्ट्रीय बीज निगम के निदेशक सहित पूर्वांचल क्षेत्र के लगभग 20 किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के निदेशक एवं लगभग 150 प्रगतिशील किसानों ने सहभागिता की। 
कार्यशाला में वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों एवं किसानों के मध्य कृषि के भविष्य, टिकाऊ खेती, जल संरक्षण एवं तकनीकी नवाचारों को लेकर सार्थक चर्चा हुई, जिसमें डॉ. श्रीनिवास, डॉ. उमा एवं डॉ. जय सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन, घटते भूजल स्तर एवं बढ़ती उत्पादन लागत के वर्तमान दौर में तकनीक आधारित, कम लागत एवं जल-संरक्षण वाली कृषि पद्धतियाँ ही भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार बनेंगी।

रिपोर्ट- युवराज जायसवाल.. वाराणसी
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