क्या कहता है मदरसा अधिनियम 2004 मदरसा शिक्षा पर होती राजनीति


क्या कहता है मदरसा अधिनियम 2004 मदरसा शिक्षा पर होती राजनीति
मदरसों से ही शिक्षा ग्रहण कर प्रथम* *राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, समाज सुधारक राजा राममोहन राय, साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने की देश सेवा
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* *ब्यूरो रिपोर्ट अजीत कुमार श्रीवास्तव शामली*
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शामली । वाराणसी की आवाज। उत्तर प्रदेश मदरसा अधिनियम 2004 उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से लागू किया गया यह कानून था। मदरसा की शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए लागू किया गया था इसके तहत मदरसा की शिक्षा प्रणाली शिक्षकों की ट्रेनिंग के लिए दिशा निर्देश दिए जाते थे साथ ही इस एक्ट के तहत मदरसा को राज्य सरकार की ओर से अनुदान मिलता था। उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड तत्कालीन सरकार योगी सरकार ने प्रदेश में संचालित 16000 मदरसो की मान्यता को खत्म कर दिया, हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से यूपी मदरसा एक्ट 2004 को निरस्त करने के बाद राज्य सरकार का भी आदेश जारी था जब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और मदरसा अधिनियम 2004 को बाहर रखा।
हम आपको बता दें कि 22 मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने यूपी मदरसा एक्ट 2004 को संवैधानिक करार देते हुए निरसत कर दिया । इसके बाद यूपी में संचालित किया जा रहे करीब 16000 मदरसो की मान्यता को योगी सरकार ने खत्म कर दिया उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में इसमें संज्ञान लिया संज्ञान लेने के बाद हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मदरसा बोर्ड अधिनियम 2004 को बाहर रखा। आपको यह भी बता दें कि मदरसा शिक्षा परिषद की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ताथानिया ( प्राथमिक स्तर) फोकानिया (जूनियर हाई स्कूल स्टार) के कल 14670 लगभग मदरसे है। बात करते हैं आलिया मदरसा की आलिया यानी मुंशी, मौलवी ,अलीम ,कामिल और फाजिल के यूपी में कुल 4536 मदरसे हैं। मुंशी मौलवी में अनुवाद विषय के तौर पर धर्मशास्त्र (शिया सुन्नी) अरबी साहित्य मौलवी उम्मीदवार के लिए फारसी साहित्य लेखक उम्मीदवार के लिए उर्दू साहित्य समान में अंग्रेजी सामान्य हिंदी की पढ़ाई कराई जाती है। वही वैकल्पिक विषय के तौर पर गणित गृह विज्ञान , राजनीति शास्त्र, सामान अध्ययन विज्ञान तिब्बती की भी पढ़ाई कराई जाती है। इसके अलावा मदरसो में धार्मिक शिक्षा में कुरान हदीस फीकह की भी पढ़ाई कराई जाती है।
आपको बता दें कि इन मदरसो को संचालित करने में राज्य सरकारों का योगदान रहता है समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में संचालित आलिया स्तर के स्थाई मान्यता प्राप्त मदरसा को अनुदान सूची में शामिल किया जाता है । जिसके लिए प्रस्ताव पारित किए जाते हैं प्रस्तावों की जांच की जाती है। जो मदरसे मानक एवं शर्तों को पूरा करते हैं । उन्हें राज्य सरकार की ओर से अनुदान दिया जाता है । मौजूदा समय में आलिया स्तर के स्थाई मान्यता प्राप्त मदरसों की कुल संख्या 560 है।
हिंदुस्तानी मदरसो को लेकर फिर से बहस छिड़ी हुई है। जिसकी विषय में बराबर कहा जा रहा है कि यहां से धार्मिक शिक्षा देकर आतंकवाद और कट्टरता के गुण सिखाए जाते हैं। यह पूरी तरह से आधुनिक शिक्षा के खिलाफ है दरअसल यह बहस असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिसवा के उस बयान के बाद छिड़ी है। जिसमें उन्होंने कहा कि असम सरकार ने 6000 मदरसो को बंद कर दिया है और सरकार की यही कोशिश रहेगी कि सभी मदरसो को बंद किया जाए। सरकार मदरसे नहीं चाहती वह स्कूल कॉलेज और यूनिवर्सिटी चाहती है। वहीं पिछले साल अगस्त में उन्होंने अपने बयानों में मदरसो को आतंकवादी ट्रेनिंग का हिस्सा बताते हुए कहा था यहां शिक्षा के बजाय आतंकी ट्रेनिंग दी जाती है और असम के मुख्यमंत्री पिछले दो सालों से लगातार असम के अंदर मदरसो को आतंकवादिता का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार की ओर से मदरसो को मिलने वाली अनुदान राशि 2020 में ही रोक दिया है और असम के लगभग 800 से ज्यादा मदरसे बंद हो चुके है और जो प्राइवेट चल रहे हैं उन पर असम सरकार आरोप लगाकर कार्रवाई कर रही है । यह पहली बार नहीं है समय-समय पर भाजपा के नेताओं की तरफ से भी मदरसा बंद करने की मांग की जाती रही है । इसमें एक नया नाम पाटिल नतयाल का जुड़ा है जो कर्नाटक की भाजपा विधायक हैं नतयाल ने कहा है कि यदि असम में सत्ता में बीजेपी आ जाए तो सारे मदरसो को बंद कर दिया जाएगा। जब से बीजेपी सरकार के अंदर में है तब से खासतौर से भाजपा शासित राज्यों में मदरसो को बंद करने की मांग की जा रही है।
हम आपको बताने जा रहे हैं कि मदरसा एक अरबी शब्द है जिसका मतलब होता है पढ़ने का स्थान यानी जहां पर शिक्षक का कार्य होता है। मूल रूप से हिब्रू भाषा से अरबी से आया है जिसे हिबरू में मिदरसा भी कहा जाता है। जैसे हिंदी का पाठशाला और अंग्रेजी का स्कूल। विश्व का पहला मदरसा 11वीं शताब्दी में बगदाद में खोला गया था जिसका नाम 'निजामिया 'मदरसा था। जिसमें भोजन के साथ-साथ आवासीय व्यवस्था पूरी तरह से निशुल्क थी ।आमतौर पर मदरसे को कट्टरपंथी ज्ञान का केंद्र बताने वाले इसकी इतिहास से परिचित नहीं है। इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को खरीदना होगा। इन इस्लामिक स्कूलों का इतिहास भी रहा है कभी इन मदरसों से देश की पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद समाज सुधारक राजा राममोहन राय जिन्हें हिंदुस्तान प्रेस का पितामह भी कहा जाता है कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने शुरुआती शिक्षा ग्रहण इन मदरसो से की थी। यदि हिंदुस्तान में मदरसा खोलने की बात की जाए तो सबसे पहले मदरसा खोलने का प्रमाण गौरी शासन के दौरान देखने को मिलता है जिसको 1991-92 ई के दौरान अजमेर में खोला गया था। लेकिन यूनेस्को की माने तो हिंदुस्तान में मदरसे की शुरुआत 13वीं शताब्दी में हुई थी ग्वालियर मदरसा देश का पहला मदरसा बताया जाता है हालांकि हिंदुस्तान में भी अंग्रेजों ने मदरसे खोले बारेन हैशिंगटन ने 1781 में कोलकाता में अंग्रेजी सरकार मे पहला मदरसा खोला।
यदि भारतीय संविधान की बात करें तो हिंदुस्तान का संविधान के अनुच्छेद 29 -30 के अनुसार शिक्षण संस्थान चलाने और उन्हें शिक्षण संस्थानों के संरक्षण का पूरा अधिकार है। आजकल मदरसो को लेकर जो बयान बाजी चल रही है यह तो पूरी तरह से आपत्तिजनक और संविधान के विरुद्ध है खास तौर से जब एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति करें तो मेरा मानना है ऐसे मामलों में तो न्यायालय को आगे बढ़कर खुद ही कार्रवाई करनी चाहिए और उन पर लगाम लगानी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 30 में शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार के बारे में बता दिया गया है।जिसमें अल्पसंख्यकों को धर्म और भाषाओं के आधार पर यह अधिकार दिए गए हैं। भारतीय संविधान अनुच्छेद 30 में कहा गया है की सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का पूरा अधिकार है। राज्य सरकार आर्थिक सहायता में अल्पसंख्यकों द्वारा प्रबंधित संस्थाओं को विभेद नहीं करेगी। हिंदुस्तान में देखा जाए तो तीन तरह की अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान देखने को मिलते हैं। राज्य से आर्थिक मदद व मान्यता लेने वाले संस्थान ऐसे संस्थान जो राज्य से मान्यता लेते हैं लेकिन उन्हें आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती है । ऐसी संस्थान जो राज्य से ना तो आर्थिक सहायता लेते हैं ना उनसे मान्यता प्राप्त करते हैं ।आजकल सत्ता के शिखर पर विराजमान लोग न सिर्फ संविधान के खिलाफ बयान बाजी कर रहे ,बल्कि देश की एक बड़ी आबादी को शिक्षा से दूर रखने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं । इनमें ज्यादातर राज्य सरकार न सिर्फ अपनी ओर से मदरसो को मिलने वाले आर्थिक मदद को रोक रहे हैं बल्कि मुसलमानों द्वारा स्वयं चलाई जाने वाले शिक्षण संस्थानों पर भी बाधा डाल रहे हैं । वही जब आप सच्चर कमेटी की रिपोर्ट देखेंगे तो आपको खुद पर रोना आएगा जिसमें साफ कहा गया है कि मुसलमान की स्थिति कई मामलों में देश के दलितो से भी बत्तर है । इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया, की मदरसे जाकर शिक्षा हासिल करने वाले अल्पसंख्यक बच्चों की तादाद चार प्रतिशत है। अगर मुस्लिम धर्म में मदरसा ना हो तो उनके ज्यादातर आबादी अशिक्षित रहेगी ।मुसलमान को शिक्षित करने में एक अच्छी भूमिका मदरसो की ही है और सच्चाई यह है की जो काम मुफ्त में सरकार को शिक्षा के प्रति करना चाहिए। वही यह मदरसे बखूबी अंजाम दे रहे हैं। देश की तरक्की में भी इनका पूरा योगदान है सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमान की आर्थिक शिक्षक और सामाजिक स्थिति बेहतर करने के लिए जो सुझाव दिए गए उनमें किसी भी सरकार ने आज तक सुध नहीं ली । जिसने अपनी रिपोर्ट में मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में शिक्षा संस्थानों की स्थापना की बात कही थी, देश के स्वतंत्रता के बाद भी सरकार बंटाधार करने में लगी हुई है ।आज भी आपको मुस्लिम बाहुलय क्षेत्र में उनके आबादी के रूप स्कूल कालेज ,यूनिवर्सिटी नहीं देखेंगे ऐसी स्थिति में पिछड़े और गरीब मुस्लिम बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी मदरसो को ही निभानी पड़ती है ।यदि यह कहा जाए तो सही होगा कि देश की एक बड़े तपके को शिक्षा से दूर करने की एक मुहिम ही है जिस कारण सरकार मदरसो को निशानी पर ले रही है।
यदि कहा जाए कि देश की आजादी की तारीख मदरसो की जिक्र के बगैर पूरी नहीं हो सकती। यदि कोई भी कलमकार इतिहास लिखने को बैठेगा चाह कर भी इसको नजरअंदाज नहीं कर सकता। हिंदुस्तान की आजादी में जो भूमिका मदरसा और उनसे शिक्षा हासिल कर निकले लोगों ने निभाया है। वह आज भी हजारों अखबारों के पन्नों सहित लाखों किताबों की पेजों पर दर्ज है ।यह साक्ष्य के रूप में अपने अंदर सरफरोश कुर्बानी, सच्चाई और बेवाकी को समेटे हुए हैं। हमारे देश की स्वतंत्रता में भूमिका अदा करने वाले मदरसो से निकलने वाले पहले मुसलमानों ने न सिर्फ देश की मोहब्बत के लिए आजादी में हिस्सा लिया बल्कि अपनी जान को भी निछावर कर दिया और अंग्रेज सत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़ने में पूरी तरह से भागीदारी फतवा जारी करते रहे इससे लोगों के बीच अंग्रेज सत्ता के खिलाफ इंकलाब पैदा हो गया ।अगर हिंदुस्तानी पत्रिकारिता के पहले किसी भाषा के पत्रकारिता के शहीद पत्रकार की बात करें, तो सबसे पहला नाम मौलवी मोहम्मद बकर का आता है जिनका सम्बन्ध उर्दू पत्रकारिता से था। जिन्होंने 1857 के दौरान अपनै अखबार "देहली अखबार' के जरिए हिंदुस्तान के अंदर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जान फूंक दी थी। और 1857 की क्रांति थमने के बाद मौलवी मोहम्मद वकार को सजा के रूम में फांसी पर लटका दिया गया था। इसके बाद अंग्रेज इतिहासकार एडवार्ड थॉमसन ने खुद लिखा कि भारत की आजादी की रूह फूंकने वाले 80000 से ज्यादा उलेमा को 1857 से 1867 तक फांसी पर लटकाया गया। इतिहास गवाह है कि यह वही मदरसे के मौलाना थे जिनकी दिल्ली के चांदनी चौक से खैबर तक ऐसा कोई पेड़ नहीं था जिन पर उनकी गर्दन ना लटकी हो।
आज यह बीजेपी के नेताओं द्वारा मदरसे पर आरोप ,आतंकवाद से जोड़कर की जा रही राजनीतिक बयान बाजी , मदरसों पर आरोप कहीं भी नहीं टिकते हैं। इस्लाम में तो सिर्फ शिक्षा जुड़ी हुई है मदरसे ने हर हाल में हरदौर में मोहब्बत ,अमन का संदेश दिया है ।अब सभी मदरसो में वक्त के हिसाब से पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए हिंदी, उर्दू, अरबी ,फारसी राजनीति, विज्ञान और इतिहास कंप्यूटर शिक्षा व नई तकनीक को जोड़ दिया है। बच्चों को शिक्षित करने का जिसे मदरसे ही बखूबी अंजाम दे रहे ,हैं और देते रहेंगे। मदरसा एक अच्छा माध्यम है बच्चों को शिक्षित करने का सत्ता के शिखर पर विराजमान लोगों द्वारा मदरसो को बंद करने की मांग करते हैं यह न सिर्फ देश के संविधान और एकता के खिलाफ है, बल्कि संविधान के उन आत्माओं को ठेस पहुंचती है जिनमें धाननिरपेक्षता की बात कही गई है, यह उन सब
बातों की ओर भी इशारा करती है जिसमें देश की एक बड़ी आबादी को शिक्षा से दूर करने की कोशिश की जा रही है। आजकल देश में काम की बातों को छोड़कर हर उस बात पर चर्चा हो रही है जिससे देश का नुकसान हो रहा है। देश के जनहित के मुद्दे इनसे बहुत पीछे छूट रहे हैं ।जरूरत इस बात की है कि जनहित के मुद्दों पर बात की जाए ।जिससे देश का विकास हो, देश की तरक्की हो देश में अमन और शांति का पैगाम हो। मदरसो ने अतीत में भी देश के लिए अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। आगे जब भी देश को जरूरत महसूस होगी यह आगे खड़े मिलेंगे सत्ता के शिखर पर पहुंचे लोगों को विद्वेष में ऐसे विभाजनकारी बयान और कार्रवाई करने से बचना चाहिए। जो कि सिर्फ एक आजादी में देश के लिए जा रहे हैं सरकार का मकसद सिर्फ जनहित के सरोकार होना चाहिए ना कि विभेदी कारण। देश का विकास शांति का पैगाम, अमन चैन तभी संभव है जब देश की सरकार है सभी को अपने साथ लेकर चलेंगे तभी हमारा देश विकास के राह पर होगा।

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