वाराणसी सीएमओ के साये में पलते है लाशों के सौदागर जो लाशों का करतें है सौदा


वाराणसी मेडिकल फील्ड भ्रष्टाचार से बजबजा रहा है। इस फील्ड में मानवीय संवेदनाओ का कोई मोल नही रह गया है। वाराणसी के एक वरिष्ठ पत्रकार के जीजा के डेडबॉडी शिवपुर के पोस्टमार्टम हाउस पहुँची। दूसरे दिन जब पोस्टमार्टम होना था तो वहां के डॉक्टरों द्वारा पाले गये वसूली गैंग ने एक कमरे से दूसरे कमरे तक डेडबॉडी लाने ले जाने के लिए 1500 रुपये की डिमांड की। जब पैसे के लिए मना किया तो सब भड़क गयें कि बिना पैसे की बॉडी नही ले जाएंगे, हम लोग इतना लेते हैं।
पत्रकार ने अपना परिचय देते हुए कहा कि पत्रकार हूँ यार और यहां दुख मुसीबत में ही कोई आता है। थोड़ी संवेदना रखो। मगर शराब गांजे के नशे में धुत वह सब दुर्व्यवहार पर उतारू थें। जब इसकी शिकायत वाराणसी सीएमओ से पत्रकार साथी आलोक श्रीवास्तव ने की तो । अंदर से एक डॉक्टर आकर कहने लगा कि आप शिकायत क्यों कर रहे हैं। अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। वह सब प्राइवेट आदमी हैं। सवाल यह है कि आप प्राइवेट आदमी रखे क्यों है..? वसूली के लिए ! क्योंकि सरकारी रहेगा तो शिकायत पर नप जाएगा। प्राईवेट रहेगा तो पल्ला झाड़ लेंगे।
वहीं पर मौजूद एक व्यक्ति ने बताया कि यहां पोस्टमार्टम के लिए आये मृतक के परिजनों से 1200 से 1500 तक वसूली होती है। वसूली के इस कमाई का हिस्सा पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर से लेकर सीएमओ दफ्तर तक जाता है। इसलिए कोई कार्यवाही नही होती। यह सब उन लोगों से भी पैसा वसूल लेते हैं जो मात्र दाह संस्कार तक के पैसे कैसे मैनेज करके आया हो।
जब इस बाबत पत्रकार मो० आरिफ़ अंसारी, कृष्णा पंडित ने इस वसूली पर सीएमओ से जवाबदेही चाहा तो उनके सहायक ने उनको मीटिंग में व्यस्त होने का हवाला देकर जवाबदेही से बचाने की कोशिश की।
सवाल यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं की दुरस्ती का दम भरने वाले स्वास्थ्यमंत्री इन लाशों के सौदागरो की करतूतों से अनजान हैं। या जानबूझकर इन्हें पाला गया है ताकि मुर्दों की मदद से कफ़नचोर डॉक्टर अपनी झोली भर सकें। वजह चाहे जो भी पीड़ित और शोषित आम जनता को ही होना है।
रिपोर्ट- आश्वनी जायसवाल, वाराणसी
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