वाराणसी विश्व धरोहर दिवस विश्व भर में मूल्यवान सम्पत्ति और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और रक्षा हेतु लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता हैं


वाराणसी विश्व धरोहर दिवस विश्व भर में मूल्यवान सम्पत्ति और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और रक्षा हेतु लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता हैं
रेलवे ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी क्रम में वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन पर धरोहर के रूप में सुसज्जित गौरवशाली, विशाल एवं भव्य मीटर गेज के क्रेन को पूर्वोत्तर रेलवे के एम. जी. ट्रैक पर कार्य करने का गौरव प्राप्त है । इस क्रेन का निर्माण 1970 में कैरेज एवं वैगन वर्कशाप पूर्वोतर रेलवे इज्जत नगर में किया गया । इस क्रेन की क्षमता 6.5 मीटर रेडियस की दशा मे अधिकतम 35 टन एवं अनप्रोप दशा में 5.0 टन है। इस का उपयोग रेलवे ट्रैक पर भारी सामग्री को उठाने एवं ट्रैक अवरोधो को हटाने में किया जाता था । इस क्रेन ने अपनी अंतिम सेवा 2014 तक वाराणसी मंडल के छपरा कचहरी थावे एम. जी. सेक्शन में दी। इसी क्रम में वाराणसी मंडल के बलिया रेलवे स्टेशन के सर्कुलेटिंग एरिया में मीटर गेज का डीजल इंजन को स्थापित कर मीटर गेज के इतिहास को संजोने का प्रयास किया गया है। इस धरोहर महत्व "डीजल इंजन का बलिया स्टेशन पर स्थापना 2015 में तत्कालीन रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु द्वारा की गई थी ।
इसके अतिरिक्त ही वाराणसी मंडल ने अपने प्रयास से नैरो गेज के इंजन को एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में बनारस स्टेशन में पर स्थापित किया है। धरोहर के रूप में बनारस रेलवे स्टेशन पर प्रदर्शित नैरो गेज (NG) डीजल इन्जन ZDM, -541 का निर्माण 1993 में चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स द्वारा किया गया था। इस इंजन को पश्चिम रेलवे के बड़ौदा मण्डल में " मियागाम कर्जन जं. से मोतीकोरल "," मलसार से डभोई जं." तथा "प्रतापनगर से जम्बूसर जं" के बीच उपयोग में लाया जाता था। जिसकी गति 50 किमी / घण्टा थी। भारत में प्रथम नैरोगेज का निर्माण 1863 में किया गया, जो उस समय बड़ौदा स्टेट रेलवे के अधीन था। कम जगह में मुड़ सकने तथा तीखी ढलान/ चढ़ाई पर चल सकने की क्षमता के कारण रेलवे में प्रारम्भिक दौर में देश के कई पहाड़ी तथा अन्य दुर्गम क्षेत्रों में नैरोगेज रेलवे लाईने बिछायी गयी थीं । वर्तमान में नैरो गेज का अधिकतर भाग बड़ी लाईन में परिवर्तित हो चुका है।
पूर्वोत्तर भारत 1875 में दलसिंगसराय से दरभंगा तक 45 मील की रेल लाइन अकाल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंची और पूर्वोत्तर रेलवे के इतिहास की आधारशिला बन गई। पूर्वोत्तर रेलवे 14 अप्रैल 1952 को अस्तित्व में आया, जब दो पूर्ण रेलवे सिस्टम अर्थात अवध तिरहुत रेलवे और असम रेलवे और बीबी और सीआई रेलवे के फतेहगढ़ जिले को एक प्रणाली में मिला दिया गया और इसका उद्घाटन भारत के पहले प्रधान मंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू ने किया था । यह पश्चिम में आगरा के पास अछनेरा से पूर्व में पश्चिम बंगाल की सीमा के पास लेडो तक फैला था। 15 जनवरी 1958 को, इसे दो क्षेत्रों (i) उत्तर पूर्व सीमांत रेलवे और (ii) गोरखपुर में मुख्यालय के साथ पूर्वोत्तर रेलवे में विभाजित किया गया था, जिसमें पांच मंडल शामिल थे। इज्जतनगर, लखनऊ, वाराणसी, समस्तीपुर और सोनपुर । 1 अक्टूबर, 2002 को, पूर्वोत्तर रेलवे के सोनपुर और समस्तीपुर मंडलों को नव निर्मित क्षेत्र पूर्व मध्य रेलवे में मिला दिया गया, जिसका मुख्यालय हाजीपुर में है। वर्तमान में, पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी, लखनऊ और इज्जतनगर में तीन मंडल हैं । इसका मुख्यालय गोरखपुर में है । यह रेलवे एक यात्री उन्मुख प्रणाली होने के कारण उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और पश्चिमी बिहार के लोगों को विश्वसनीय परिवहन सुविधा प्रदान करती है और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विकास को भी गति प्रदान करती है। यह रेलवे पड़ोसी देश नेपाल की परिवहन जरूरतों को भी पूरा करता है। पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी मंडल का गठन 01.05.1969 को किया गया था। ब्रॉड गेज लाइन पर मंडल के मुख्य मार्गों में गोरखपुर-छपरा, भटनी-प्रयागराज रामबाग, छपरा-औंरिहार, मऊ-शाहगंज, गोरखपुर-पनियाहवा, इंदारा-फेफना, औंडीहार- जौनपुर, कप्तानगंज- थावे और छपरा कचेरी-थावे खंड शामिल हैं । इंदारा -दोहरी घाट केवल मीटर गेज खंड (गेज परिवर्तन के तहत) है।
वाराणसी मंडल मुख्य रूप से एक यात्री यातायात उन्मुख मंडल है। 1981 तक जब गोरखपुर-सीवान खंड पर आमान परिवर्तन का कार्य प्रारंभ हुआ तो यह मंडल मूल रूप से मीटर गेज मार्ग प्रणाली था। इसके बाद, गेज परिवर्तन कई चरणों में पूरा किया गया: वाराणसी-भटनी (वर्ष-1990), वाराणसी-प्रयागराज रामबाग (वर्ष-1993-94), औंडीहार-छपरा (वर्ष-1996), मऊ-शाहगंज (वर्ष-1997), गोरखपुर- पनियाहवा (वर्ष-1997), इंदारा-फेफना (वर्ष-1999), औंरिहार-जौनपुर, कप्तानगज-थावे (वर्ष 2011) और छपरा कचहरी-थावे (वर्ष 2016-17)। इस प्रकार, केवल इन्दारा-दोहरी घाट खंड को छोड़कर, मंडल के अन्य सभी खंडों पर आमान परिवर्तन का कार्य पूरा कर लिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, वाराणसी मंडल मुख्य रूप से ब्रॉड गेज डिवीजन बन गया है। मंडल पर मालगाड़ियों के चलने के प्रमुख मार्गों में गोरखपुर-छपरा, वाराणसी-गोरखपुर, प्रयागराज रामबाग-वाराणसी-छपरा, गोरखपुर-पनियाहवा और इंदारा-फेफना शामिल हैं। देश के उत्तरी और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों से आने-जाने वाली ट्रेनें इन मार्गों से गुजरती हैं। मंडल के आठ इंटरचेंज पॉइंट हैं: - छपरा ग्रामीण स्टेशन (सोनपुर डिवीजन के साथ), पनियाहवा (समस्तीपुर डिवीजन के साथ), गोरखपुर कैंट (एन.ई. रेलवे / लखनऊ डिवीजन के साथ), जौनपुर, शाहगंज, लोहटा और वाराणसी स्टेशन (उत्तर रेलवे/लखनऊ डिवीजन के साथ) हैं और प्रयागराज जंक्शन (उत्तर मध्य रेलवे / प्रयागराज डिवीजन के साथ)। चीनी उत्पाडॉन का परिवहन वाराणसी मंडल में एकमात्र उद्योग था कालान्तर में वरंसिमंद्ल के क्षेत्र में 31 चीनी मिलें हैं, इनमें से ज्यादातर या तो बीमार हो गई या बंद कर दी गईं इसलिए इस मंडल का मुख्य राजस्व आय का श्रोत यात्री यातायात पर निर्भर है ।
*अशोक कुमार*
जन सम्पर्क अधिकारी, वाराणसी

सम्पत्ति की लालच में पुत्र द्वारा षडयंत्र कर पिता की हत्या कर शव को झाड़ी में फेंके जाने के मामले का थाना रामनगर पुलिस द्वारा 12 घण्टे के अन्दर अनावरण कर घटना में संलिप्त 2 अभियुक्त को गिरफ्तार
